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बसंत पंचमी: चेतना का वसंत और ऋतंभरा प्रज्ञा का उत्सव


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बसंत पंचमी: चेतना का वसंत और ऋतंभरा प्रज्ञा का उत्सव

भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का चक्र केवल मौसमी परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के क्रमिक विकास की यात्रा है। बसंत पंचमी इसी विकास का चरमोत्कर्ष है।

– डॉ अनिल कुमार शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर हिन्दी-सेठ जी बी पोदार कॉलेज, नवलगढ़, जिला-झुंझुनूं राजस्थान

बसंत पंचमी : यह पर्व ‘सत्व’ के ‘तम’ पर विजय का उद्घोष है। जब शिशिर की रिक्तता के बाद प्रकृति का कण-कण पल्लवित होता है, तब वह दृश्यमान जगत में उसी सृजन शक्ति का प्रमाण देता है जिसे हम ‘सरस्वती’ कहते हैं।

सरस्वती का दार्शनिक स्वरूप: शब्द से ब्रह्म तक

माँ सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि वे ‘वाक’ (वाणी) की अधिष्ठात्री हैं। ऋग्वेद में देवी सूक्त के अंतर्गत वाक की महिमा का वर्णन है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करती हैं। परिष्कृत दृष्टि से देखें तो सरस्वती के चार आयुध गहरे मनोवैज्ञानिक संकेत देते हैं:

  • वीणा: यह ब्रह्मांडीय नाद और हमारे शरीर की ‘इड़ा-पिंगला’ नाड़ियों के सामंजस्य का प्रतीक है। जीवन में संगीत और लयबद्धता के बिना ज्ञान केवल शुष्क सूचना बनकर रह जाता है।
  • यह ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ का आधार है, जो संचित मेधा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम है।
  • स्फटिक माला: यह एकाग्रता और निरंतर आत्म-मंथन की प्रतीक है।
  • कमल: कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहने की कला।

उनका श्वेत वर्ण इस बात का द्योतक है कि ज्ञान जब अपने शुद्धतम रूप में होता है, तो वह निष्पक्ष और पारदर्शी होता है।

जनजीवन में रूपांतरण: जड़ता से चैतन्य की ओर

बसंत का आगमन भारतीय जनमानस में एक मनोवैज्ञानिक क्रांति लेकर आता है। किसान के लिए यह श्रम के प्रतिफल की आशा है, तो कलाकार के लिए यह नवीन प्रेरणा का स्रोत। सामाजिक दृष्टि से यह पर्व ‘समरसता’ का संदेश देता है। पीला रंग, जो इस दिन का प्रधान वर्ण है, वह केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं वरन ‘शुद्ध सात्विक बुद्धिमत्ता’ और ‘ऊर्जा’ का प्रतीक है। यह रंग सूर्य की किरणों के उस प्रभाव को दर्शाता है जो अंधकार को चीरकर ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में चिंतन: ‘सेंसिटिविटी’ बनाम ‘कनेक्टिविटी’
आज का युग ‘तकनीकी वर्चस्व’ का युग है। हमारे पास ‘कनेक्टिविटी’ तो बहुत है, लेकिन ‘सेंसिटिविटी’ (संवेदनशीलता) लुप्त होती जा रही है। वर्तमान चिंतन का मुख्य बिंदु यह है कि क्या हम मशीनी ज्ञान के दास बनते जा रहे हैं?

  • विवेक का संकट: आज एआई (AI) और डेटा के दौर में ‘ज्ञान’ (Knowledge) तो सुलभ है, परंतु ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) दुर्लभ है। सरस्वती का ‘हंस’ हमें सिखाता है कि सत्य और मिथ्या (Deepfake और Fake News के दौर में) के बीच भेद कैसे किया जाए।
  • कला का व्यावसायीकरण: वीणा का संगीत आज शोर में बदल रहा है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में माँ सरस्वती की उपासना का अर्थ है-कला और विधा की पवित्रता को बाज़ारवाद से बचाना।
विद्यार्थियों के लिए संदेश: ‘साधना’ ही ‘सिद्धि’ है
आधुनिक विद्यार्थियों के लिए यह लेख एक आह्वान है कि वे ‘शॉर्टकट’ की संस्कृति से ऊपर उठें।

  • मौन की शक्ति: माँ सरस्वती मौन और एकाग्रता की देवी हैं। शोर-शराबे वाले डिजिटल युग में, जो विद्यार्थी प्रतिदिन कुछ क्षण मौन रहकर आत्म-चिंतन करेगा, वही वास्तविक मेधा को प्राप्त करेगा।
  • विनयशीलता: “विद्या ददाति विनयम”। यदि ज्ञान अहंकार बढ़ा रहा है, तो वह सरस्वती का नहीं, बल्कि केवल ‘अविद्या’ का प्रसार है
  • सृजनात्मक उत्तरदायित्व: आप जो सीखते हैं, उसका उपयोग केवल आजीविका के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए करें।

उपसंहार: एक वैचारिक बसंत की प्रतीक्षा
बसंत पंचमी केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है। यह हमें सिखाती है कि जैसे प्रकृति स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य को भी अपनी वैचारिक जड़ता को त्याग कर नवीन ज्ञान के प्रति उन्मुख होना चाहिए। आज विश्व को विनाशकारी हथियारों की नहीं, बल्कि वीणा के मधुर स्वर और पुस्तक के शाश्वत बोध की आवश्यकता है।

जब तक मानवता के हृदय में करुणा और मस्तिष्क में विवेक का वास रहेगा, माँ सरस्वती का वह श्वेत स्वरूप हमारे भीतर मुस्कराता रहेगा। – डॉ अनिल कुमार शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर हिन्दी-सेठ जी बी पोदार कॉलेज, नवलगढ़, जिला-झुंझुनूं राजस्थान

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