रास्ते नहीं, फिर भी नीलाम कर दीं 25 नई खदानें; 14 साल से 50 से ज्यादा लीज बंद
नीमकाथाना-पाटन में खदान मालिकों और ग्रामीणों के बीच टकराव, 80 से अधिक खदानों पर गतिरोध का दावा; कारोबारियों के करोड़ों रुपए फंसे
सीकर : खदानों तक पहुंचने के रास्तों का विवाद खनन कारोबारियों और ग्रामीणों के बीच टकराव का बड़ा कारण बना हुआ है। नीमकाथाना-पाटन क्षेत्र में कई खदानों तक पहुंचने के रास्ते नहीं हैं, वहीं कुछ जगहों पर ग्रामीणों की आपत्तियों के चलते खनन लंबे समय से बंद है। इसके बावजूद इसी साल क्षेत्र में 25 से अधिक खदानों की नीलामी किए जाने से खान विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। पड़ताल के अनुसार, क्षेत्र में करीब 80 खदानों को लेकर ग्रामीणों और खनन कारोबारियों के बीच गतिरोध बना हुआ है। वहीं, 30 से अधिक क्रेशर संयंत्रों के आसपास भी विरोध की स्थिति सामने आती रहती है।
पूर्व भाजपा विधायक अतर सिंह भड़ाना की हत्या के बाद खदानों तक पहुंचने के रास्तों को लेकर खान विभाग सतर्क हुआ है। विभाग गतिरोध वाली खदानों की सूची तैयार कर समस्या के समाधान की दिशा में काम कर रहा है। हालांकि, सवाल यह है कि जब पुरानी खदानों के रास्तों का विवाद वर्षों से नहीं सुलझा, तो नई खदानों की नीलामी से पहले रास्तों की उपलब्धता और विवादों की स्थिति का आकलन क्यों नहीं किया गया।
प्रति खदान करीब एक करोड़ रुपए का निवेश, फिर भी खनन बंद
नीमकाथाना-पाटन क्षेत्र में रास्तों के विवाद के कारण खनन कारोबारियों का करोड़ों रुपए का निवेश अटका हुआ है। माइनिंग एंड क्रेशर वेलफेयर सेवा समिति के अध्यक्ष सुंदरमल सैनी के अनुसार, नीलामी में एक खदान पर करीब एक करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी कारोबारी खनिज नहीं निकाल पा रहे हैं। उनका आरोप है कि डाबला की 52 खदानों के रास्ते खुलवाने के लिए न्यायालय के निर्देश होने के बावजूद प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। कारोबारियों ने यह समस्या जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुंचाई है। क्षेत्र में लौह अयस्क और चेजा पत्थर की खदानें हैं।
डाबला की 52 लीज वर्ष 2012 से विवादों में
पड़ताल में सामने आया कि डाबला में रास्तों के विवाद के चलते करीब 52 खदानों पर वर्ष 2012 में रोक लगाई गई थी। ये खदानें करीब 14 साल से बंद बताई जा रही हैं। इनमें से कई लीज निरस्त होने के बाद दोबारा नीलाम भी की गईं, लेकिन रास्तों का विवाद नहीं सुलझ सका। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुरानी लीजों पर खनन शुरू नहीं हो पाया, तो विवाद की स्थिति की जांच किए बिना नई नीलामी कैसे कर दी गई।
मीणा की नांगल में 10 तथा टोडा और चीपलाटा में एक-एक खदान के रास्तों को लेकर विवाद बताया जा रहा है। चीपलाटा में ग्रामीण कई महीनों से धरने पर बैठे हैं।
विभाग का तर्क—रास्ता बनाना लीजधारक की जिम्मेदारी
खान विभाग के अनुसार, खदान तक रास्ता बनाना लीजधारक की जिम्मेदारी है। लेकिन विवादित जमीन या रास्ते को लेकर ग्रामीणों की आपत्तियां हों, तो नीलामी से पहले उनकी जांच और समाधान की जिम्मेदारी किसकी है? यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या नीलामी से पहले रास्ते की उपलब्धता और विवादों की स्थिति का पर्याप्त आकलन किया गया था।
अब केवल विवादित खदानों की सूची बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है कि प्रत्येक मामले की समीक्षा कर जिम्मेदारी तय की जाए और समाधान के लिए समयसीमा निर्धारित हो, ताकि नीलामी के बाद भी खनन शुरू नहीं होने जैसी स्थिति से बचा जा सके। वहीं, जिले के खंडेला-श्रीमाधोपुर और दांतारामगढ़ खनन क्षेत्रों की 230 लीजों में रास्तों को लेकर विवाद नहीं होने की जानकारी दी गई है।
चारागाह से रास्ता बनाने का आरोप, न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद बंद हुआ
अवैध खनन के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रहे जयराम सिंह डाबला के अनुसार, डाबला की 52 खदानों तक पहुंचने का रास्ता नदी और चारागाह भूमि से होकर गुजरता था। उन्होंने इसका विरोध करते हुए कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद खदानों पर रोक लग गई। उनके मुताबिक, रास्ते को लेकर कई महीनों तक विवाद चला।
जयराम सिंह का कहना है कि राजनीतिक दखल के जरिए दो बार रास्ता बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन दोनों बार न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद रास्ते का काम बंद हो गया। इसके बावजूद कुछ लीजों की दोबारा नीलामी की गई, जबकि मूल विवाद का समाधान नहीं हो पाया।
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