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दशहरा (विजयादशमी): धर्म की विजय, शक्ति की आराधना और राजस्थान की समृद्ध परंपराओं का पर्व


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धर्म/ज्योतिष

दशहरा (विजयादशमी): धर्म की विजय, शक्ति की आराधना और राजस्थान की समृद्ध परंपराओं का पर्व

शमी पूजन, शस्त्र पूजा, सीमोल्लंघन और रावण दहन से जुड़ी हैं अनेक धार्मिक मान्यताएं; कोटा का ऐतिहासिक दशहरा मेला राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख आकर्षण

दशहरा (विजयादशमी): भारतीय संस्कृति में दशहरा अथवा विजयादशमी का पर्व धर्म, साहस, शक्ति और विजय का प्रतीक माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर सद्बुद्धि की विजय का संदेश देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया था। वहीं, देश के अनेक हिस्सों में विजयादशमी को मां दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय प्राप्त करने की स्मृति से भी जोड़ा जाता है।

राजस्थान में इस पर्व का धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। शमी यानी खेजड़ी वृक्ष का पूजन, अस्त्र-शस्त्रों की पूजा, अपराजिता देवी की आराधना, सीमोल्लंघन और रामलीला के समापन के साथ रावण दहन जैसी परंपराएं इस त्योहार को विशिष्ट बनाती हैं। रियासती काल में दशहरा राजदरबारों,  शौर्य प्रदर्शन और पारंपरिक पूजन का अवसर भी हुआ करता था।

विजयादशमी नाम की मान्यता

दशहरा को विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपराओं में देवी विजया और विजय प्राप्ति की भावना से इस पर्व के नाम को जोड़ा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र का विशेष संयोग विजय योग कहलाता है। इस कारण भी इस दिन को विजय कार्यों के लिए शुभ माना जाता है।

संकलनकर्ता किशोर सिंह चौहान ‘दिवेर’ प्रवक्ता एवं लेखक प्रतिष्ठा पब्लिकेशन उदयपुर

हालांकि, दशहरे के नाम और उससे जुड़ी धार्मिक व्याख्याओं के संबंध में अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। इन सभी का मूल भाव विजय, मंगल और धर्म की स्थापना से जुड़ा हुआ है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को दशहरा अथवा विजयादशमी कहते हैं। मान्यता है कि भगवती (विजया) के नाम पर यह पर्व ‘विजया दशमी’ कहलाता है। श्रवण नक्षत्र में दशमी का योग ‘विजय-योग’ कहलाता है। इसलिए भी इसे विजया दशमी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण पर विजय प्राप्त की थी।

यह शक्ति-पूजा का त्यौहार है। यद्यपि इस पर्व में सम्पूर्ण हिन्दू समाज सम्मिलित होता है तथापि परम्परागत रूप से यह क्षत्रियों का त्यौहार है। रियासती काल में राजा लोग इस दिन दरबार का आयोजन करते थे तथा सूअर का शिकार खेलने जाते थे। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग दरबार में उपस्थित होकर राजा को भेंट दिया करते थे। दशहरे के दिन खेजड़ी (शमी) वृक्ष, हाथी-घोड़े एवं अस्त्र-शस्त्रों का पूजन करने का विधान है। इस दिन लीलटाँस पक्षी का दर्शन करना शुभ माना जाता है।

दशहरे की सायंकाल में देश के विभिन्न नगरों, कस्बों एवं गांवों में भगवान श्रीराम की सवारी निकाली जाती है जिसमें भगवान रामचंद्र, लक्ष्मण, सीताजी, हनुमानजी एवं जाम्बवंत आदि की झांकियां सजाई जाती हैं। अनेक स्थानों पर रामलीलाओं के पात्र ही इस शोभायात्रा में झांकी के रूप में चलते हैं। शोभयात्रा के अंत में रामलीला के नायक श्रीराम द्वारा रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। कहीं-कहीं पर शूपर्णखा का पुतला भी जलाया जाता है।

विजयादशमी व्रत

विजयादशमी के व्रत के लिए दिन में तीसरे प्रहर (अपराह्न काल) में दशमी होनी आवश्यक मानी गई है। यदि नवमी के अपराह्न में ही दशमी होती है तो नवमी को ही विजयादशमी होती है और यदि दशम तिथि के तीसरे प्रहर में दशमी रहे तो दशमी को विजयादशमी मनाई जाती है।

यदि दशमी दो हों तो अपराहन में रहने वाली दशमी ही ग्राह्य है। यदि अपराह्न में श्रवण नक्षत्र हो तो वह और भी उत्तम माना जाता है। दोनों ही दिन यदि श्रवण नक्षत्र आ जाये तो वह और अधिक श्रेष्ठ है।

विधि-विधान

इस दिन चार शुभ कार्य किये जाते हैं (1) अपराजिता देवी का पूजन, (2) शमी वृक्ष (खेजडी) का पूजन, (3) सीमा लांघना और (4) देशान्तर जाने के लिए प्रस्थान। सर्वप्रथम अपराजिता देवी का पूजन किया जाता है। तीसरे प्रहर ईशान दिशा में गमन करके पवित्र स्थान पर धरती लीपते हैं। फिर वहाँ गेरू लीपकर लाल कपड़े पर चावल का अष्टदल बनाया जाता है और आसन पर बैठकर आचमन, प्राणायाम करके यह सकंल्प किया जाता है- ‘मैं अपने कुटुम्ब के लिये अपराजिता देवी का पूजन करूंगा।’ फिर अष्टदल के मध्यभाग में देवी की मूर्ति रखकर उसकी पूजा करते हैं। ‘अपराजितायै नमः’ मंत्र से देवी का आवाहन करते हैं।

इसके पश्चात् अपराजिता देवी के दाईं ओर ‘क्रियाशक्त्ये नमः’ मंत्र से जया देवी का आवाहन किया जाता है। अपराजिता देवी के बाईं ओर ‘उमायै नमः’ मंत्र से विजया देवी का आवाहन किया जाता है।

तीनों देवियों को बारी-बारी से नमस्कार करते हुए षोडशोपचार से उनकी पूजा की जाती है। प्रत्येक मंत्र के साथ देवी को वही वस्तु अर्पित की जाती है, जिसका उल्लेख मंत्र में हुआ है-

अपराजितायै नमः आसनं समर्पयामि, पाद्यं समर्पयामि, अर्घ्यं समर्पयामि, स्नानम् समर्पयामि, वस्त्रं समर्पयामि, कुंकुं समर्पयामि, चंदनं समर्पयामि, अक्षतान् समर्पयामि, पुष्पाणि समर्पयामि, धूपं समर्पयामि, दीपं समर्पयामि, नैवैद्यम् समर्पयामि, फलम् समर्पयामि, ताम्बूलं समर्पयामि, दक्षिणां समर्पयामि।

जयायै नमः आसनं समर्पयामि, पाद्यं समर्पयामि, अर्घ्यं समर्पयामि, स्नानम् समर्पयामि, वस्त्रं समर्पयामि, कुंकुं समर्पयामि, चंदनं समर्पयामि, अक्षतान् समर्पयामि, पुष्पाणि समर्पयामि, धूपं समर्पयामि, दीपं समर्पयामि, नैवैद्यम् समर्पयामि, फलम् समर्पयामि, ताम्बूलं समर्पयामि, दक्षिणां समर्पयामि।

विजयायै नमः आसनं समर्पयामि, पाद्यं समर्पयामि, अर्घ्यं समर्पयामि, स्नानम् समर्पयामि, वस्त्रं समर्पयामि, कुंकुं समर्पयामि, चंदनं समर्पयामि, अक्षतान् समर्पयामि, पुष्पाणि समर्पयामि, धूपं समर्पयामि, दीपं समर्पयामि, नैवैडाम् समर्पयामि, फलम् समर्पयामि, ताम्बूलं समर्पयामि, दक्षिणां समर्पयामि।

षोडशोपचार से पूजन के पश्चात् यह प्रार्थना की जाती है-
इमां पूजां मयादेवि, यथाशक्ति निवेदिताम्। रक्षार्थं तु समागम्य, व्रतस्वनमुत्तमम् ।।

अर्थात्- हे देवी, मैंने यह पूजा आपकी सेवा में यथाशक्ति अर्पित कर दी है अतः आप मेरी रक्षा करने के लिए पधारकर मेरे इस उत्तम व्रत को सम्पन्न करें।

यदि कोई राजा यह मंत्र पढ़े तो उसे इस प्रकार पढ़ा जाता है-

इमां पूजां मयादेवि, यथाशक्ति निवेदिताम्। यात्रायां विजयार्थन्च, व्रतस्वनमुत्तमम् ।।

उसके बाद देवी को नमस्कार करते हुए कहा जाता है-

हारेण तु विचित्रेण, भास्वरकनकमेखला। अपराजिता भद्रस्तां, करोतु विजयं मम ।।

अर्थात्- हे विचित्र प्रकार के हार धारण करने वाली माता, आपकी करधनी चमकते हुए सोने से अभिमंडित है। आप सदैव अपराजेय और कल्याणकारी हैं, मुझे विजय प्रदान कीजिए।

प्रार्थना के पश्चात् पुनः पूजन करके देवियों का विसर्जन किया जाता है। देवी पूजन के पश्चात् विजय हेतु प्रस्थान किया जाता है।

विजय प्रस्थान

1. ‘विजय मुहूर्त’ दो प्रकार के होते हैं। एक तो दशमी की संध्या को तारे निकलने पर और दूसरा निम्नलिखित संख्याओं के अनुसार किया जाता है। दोनों को ही ‘विजय-मुहूर्त’ कहते हैं।

2. दिन के 15 हिस्से किए जाते हैं, 11वाँ हिस्सा विजयमुहूर्त है। यदि 30 घड़ी का दिन है तो उस दिन में 15 मुहूर्त होते हैं। यदि दो घड़ी का मुहूर्त हो तो 20 घड़ी के बाद 2 घड़ी का मुहूर्त ‘विजयमुहूर्त’ कहलाता है। इस मुहूर्त में यात्रा का मुहूर्त भी किया जाता है। एक घड़ी में 20 मिनट होते हैं।

विजय मुहूर्त में ग्राम या नगर के बाहर ईशानकोण की तरफ जाकर शमी (खेजड़ी) की पूजा की जाती है। राजा अपने पुरोहित और मंत्रियों के साथ घोड़े पर बैठकर खेजड़ी के पास जाता है और घोड़े से नीचे उतरकर ‘स्वस्तिवाचन’ करता है। तत्पश्चात् शमी की पूजा करके यह संकल्प करता है- ‘मेरे पाप और अमंगल को दूर करने के लिए, मेरे कल्याण के लिये, मुझे यात्रा में विजय प्रदान करने के लिए मैं शमी वृक्ष की पूजा करता हूँ।’

शमी वृक्ष नहीं मिले तो ‘अश्मन्तक’ वृक्ष की पूजा की जाती है। अश्मन्तक को ‘आपटा’ भी कहते हैं। राजा शमी के मूल में दिक्पालों इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋत वरुण, वायु, कुबेर, शिव, ब्रह्मा, विष्णु की पूजा उनके नाम-मंत्र से की जाती है।

‘वास्तुदेवाय नमः’ मंत्र से ‘वास्तु’ की पूजा की जाती है। पूजा के समय हाथ जोड़कर इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है-

अमगंलानंशमनीं, शमनीं दुष्कृतस्य च। दुःखप्रणाशिनीं धन्यां, प्रपद्येऽहं शर्मी शुभम् ।।

अर्थात्- अमंगलों का नाश करने वाली, पापों की विध्वंसिनी और दुःख विनाशिका हे शमी (खेजड़ी), तुम धन्य हो। मैं आपकी श्रेयस्करी शरण में आया हूँ।

पूजा के अंत में यह प्रार्थना की जाती है- शमी शमयते पापं, शमी लोहितकण्टका। करिष्यमाणं यात्रायां, दुग्धां कालं सुखं मया। तद्वत् निर्विघ्नकर्त्रत्वं, भव श्रीरामपूजिते। अर्थात् हे शमी, आप सभी पापों का नाश करने वाली तथा लाल कांटों को धारण करने वाली हैं। आप मेरी यात्रा को सफल कीजिए तथा मेरे दुःखों को दूर करने के लिए सुख प्रदान कीजिए। इसी दिन राम ने भी रणयात्रा के पहले शमी के पूजा की थी।

यदि खेजड़ी न हो तो अश्मन्तक (आपटा) वृक्ष से यह प्रार्थना की जाती है- अश्मन्तकमहावृक्षः, महादोषनिवारणः । इष्टानां दर्शनं देहि, शत्रूणांच विनाशनम् ।। अर्थात्- हे अश्मंतक नामक महावृक्ष, आप मेरे दोषों को दूर कीजिए तथा मुझे अपने प्रियदर्शन दीजिए ताकि मेरे शत्रुओं का नाश हो सके।

फिर खेजड़ी या आपटा के पास शुद्ध पात्र रखकर उसमें वृक्ष के पास की गीली मिट्टी एवं चावल भरे जाते हैं। इन्हें गाजे-बाजे के साथ घर ले जाते हैं। इस मिट्टी को घर लाना, लक्ष्मी को घर लाना समझा जाता है। वह मिट्टी घर लाकर पवित्र स्थान पर रख दी जाती है। घर की सुहागिन स्त्रियां व्रतकर्ता की आरती करती हैं।

नगर के बाहर जाकर शत्रु की मर्ति बनाई जाती है और उससे कुछ दूर खड़े होकर धनुष पर बाण चढ़ाकर शत्र की छाती पर मारा जाता है। यह बाण सोने के पंख वाला होता है। इस क्रिया के बदले रावण का पुतला बनाकर तथा भगवान श्रीराम की पूजा करके राजा श्रीराम की सवारी निकाली जाती है। शत्रु की जगह रावण को जलाया जाता है। यह कार्य शमी की पूजा के तुरन्त पश्चात् भी कर सकते हैं।

सीमोल्लंघन

प्राचीन काल में राजा, दशानन दहन के पश्चात् नवीन वस्त्र पहनकर तथा राज्यचिह्न धारण कर ‘सीमोल्लंघन’ करता था। इस अवसर पर ब्राह्मण द्वारा मार्गदेवता के मंत्र और विजय के मन्त्र पढ़े जाते थे। राजा अपने राज्य की सीमा पार करके सीमा की पूजा करता था। मार्ग में जितने देवमन्दिर आते थे, उनकी पूजा की जाती थी। साथ ही वास्तु देवता एवं दिग्पालों की पूजा की जाती थी। वहीं पर सुवर्ण की पूजा की जाती थी। इसके पश्चात् राजा सुवर्ण लेकर गाजों बाजों के साथ अपने राजभवन लौटता था। सुवासिनियों को वस्त्र अलंकार देकर देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती थी। अन्त में पुरोहित एवं ब्राह्मणों की पूजाकर उन्हें दक्षिणा दी जाती थी। इस पूजा के अंत में वेश्याएं राजा की आरती करती थी। जब से राजाओं के राज समाप्त हुए, तब से यह परम्परा बंद हो गई है।

कोटा का दशहरा

कोटा के दशहरा देश भर में प्रसिद्ध है। कोटा में बनने वाले रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाद के पुतले विशेष आकर्षण के विषय होते हैं। ई.1579 में कोटा के प्रथम हाड़ा शासक राव माधोसिंह द्वारा स्थापित यह परम्परा 400 वर्षों से चली आ रही है। इस अवसर पर कोटा में विशाल मेला लगता है जिसमें देश के दूरस्थ भागों से सैकड़ों दुकानदार अपनी वस्तुओं की बिक्री के लिए आते हैं। इस मेले में पशुओं की भी बिक्री होती है। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन, मुशायरे एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन किए जाते हैं तथा विशाल प्रदर्शनी लगाई जाती है।

परीक्षा संबंधी बिंदु

  • दशहरा देखने का शौक मुगल बादशाह जहांगीर को था.
  • दशहरे के दिन लीलटांस पक्षी ( किंगफिशर) के दर्शन शुभ माने जाते हैं
    नोट :- प्रसिद्ध ग्रंथ ‘लीलटांस’ के लेखक श्री कन्हैयालाल सेठिया जी चूरू है
  • इस दिन भगवान राम ने रावण को मारा था इसी कारण इसे वीरों का पर्व भी कहते हैं.
  • रावण का ससुराल मंडोर जोधपुर में था इस दिन ओझा और श्रीमाली ब्राह्मण तथा पालीवाल ब्राह्मण रावण का पुतला नहीं जलाते हैं.
  • सबसे बड़ा दशहरा मेला मैसूर कर्नाटक में वाडियार घराने से जुड़ा हुआ है
  • राजस्थान का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दशहरा मेला कोटा उसके बाद निंबाहेड़ा चित्तौड़गढ़ में भरता है
  • बस्तर छत्तीसगढ़ में दुनिया का सबसे लंबा दशहरा उत्सव 75 दिन तक चलता हैसंदर्भ ग्रंथ सूची
  • राजस्थान के तीज त्यौहार एवं व्रत डॉ एम एल गुप्ता
  • राजस्थान के व्रत और उत्सव डॉ महेंद्र सिंह नगर
  • मेवाड़ का सांस्कृतिक इतिहास डॉ सुशीला शक्तावत
  • राजस्थान का इतिहास संस्कृति परंपरा और विरासत दो हुकम चंद जैन और डॉ नारायण लाल मालीसंकलनकर्ता किशोर सिंह चौहान ‘दिवेर ‘
    प्रवक्ता एवं लेखक
    प्रतिष्ठा पब्लिकेशन उदयपुर

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