मुसलमानों के मुद्दों पर काम करने के लिए 51 सदस्यीय राष्ट्रीय निगरानी समिति की घोषणा
51 सदस्यीय राष्ट्रीय निगरानी समिति भारतीय मुसलमानों से जुड़े मुद्दों के लिए संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक रास्ते अपनाएगी
नई दिल्ली : 24 जुलाई 2026 को दिल्ली में आयोजित मुस्लिम सामाजिक धार्मिक नेताओं और बुद्धिजीवियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में लिए गए फैसले के बाद मंगलवार को 51 सदस्यीय राष्ट्रीय निगरानी समिति का ऐलान किया गया। इस समिति में सामाजिक, धार्मिक, कानूनी, राजनीतिक और सिविल सोसाइटी से जुड़े प्रमुख लोग शामिल हैं।
समिति का गठन भारतीय मुसलमानों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक रास्ते अपनाने और संविधान में मिले अधिकारों, नागरिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व और समुदाय से जुड़े दूसरे मामलों पर मिल-जुलकर कार्रवाई करने के लिए किया गया है।
समिति के ऐलान के लिए नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, जिसे समिति के कई प्रमुख सदस्यों ने संबोधित किया। समिति में कानून, सार्वजनिक जीवन, राजनीति, सामाजिक काम, धार्मिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले लोग शामिल हैं। इसका मकसद लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से इन मुद्दों को उठाना है।
राष्ट्रीय निगरानी समिति की 24वीं बैठक में यह तय किया गया कि जिन इलाकों में संकट और गंभीर चुनौतियां हैं, वहां दौरे किए जाएंगे। इसका मकसद मुस्लिम समुदाय के बीच भरोसा बढ़ाना और स्थानीय लोगों व संगठनों से सीधे बात करना है। पहला दौरा उत्तराखंड का करने का फैसला किया गया, क्योंकि यह दिल्ली के करीब है और राज्य में कई मुद्दे सामने आ रहे हैं। इसके तहत एक प्रतिनिधिमंडल ने देहरादून का दौरा किया और उत्तराखंड के सिविल सोसाइटी प्रतिनिधियों तथा मुस्लिम नेतृत्व के साथ कई बैठकें कीं।
पहली बैठक उत्तराखंड के प्रमुख सिविल सोसाइटी सदस्यों के साथ हुई। इसमें राज्य की मौजूदा स्थिति और समाज के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। वरिष्ठ कांग्रेस नेता गुरदीप सप्पल भी बैठक में मौजूद रहे। दूसरी बैठक उत्तराखंड के मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ हुई, जिसमें राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व के लोग शामिल हुए। बैठक में समुदाय के सामने मौजूद चिंताओं और राज्य की व्यापक स्थिति पर चर्चा हुई।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में समिति के सदस्यों ने कहा कि भारतीय मुसलमानों के अधिकारों और हितों से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए सरकारी संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ मिलकर काम करना जरूरी है।
सलमान खुर्शीद ने कहा, “इस आंदोलन ने सभी को एक साथ लाया है। यह भारत के मुसलमानों की तरफ से एक पहल है। हम यहां किसी से भीख मांगने नहीं आए हैं, बल्कि यह बताने आए हैं कि इस देश के हर नागरिक के अपने अधिकार हैं। देश में हमारी अलग-अलग तरह की विविधता के बावजूद हम सभी के अधिकार बराबर हैं। हम सभी लोगों को अपने साथ जुड़ने और कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए आमंत्रित करते हैं। हम भारत में हो रहे एक बड़े मुद्दे में अपना योगदान देना चाहते हैं।”
मौलाना अत्ताउर रहमान कासमी ने कहा, “इस वक्त यह कारवां समाज की सबसे बड़ी जरूरत है। इसकी जरूरत सिर्फ शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवों और देहातों में भी महसूस की जा रही है। यह कारवां पूरब से पश्चिम तक जाए, देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों तक पहुंचे और उन लोगों को सहारा दे जो खुद को हाशिये पर और कमजोर महसूस कर रहे हैं।”
मोहम्मद अदीब ने कहा, “मैंने कुछ पत्रकारों को यह सवाल करते सुना कि क्या यह आंदोलन पर्सनल लॉ बोर्ड या जमाअत के खिलाफ है। शरीयत से जुड़े मामलों में हम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत हैं और उसकी रहनुमाई पर चलते हैं। हमारा काम राजनीतिक दायरे में है। यह संगठन किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि सबको साथ लेकर चलना और मिलकर काम करना चाहता है।”
नदीम खान ने स्थिति की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा, “पूरे देश में हम ध्वस्तीकरण, विस्थापन, पुशबैक और धार्मिक स्थलों पर हमले देख रहे हैं, जिनसे मुसलमान खास तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। असम में हजारों परिवार विस्थापित हुए हैं, जबकि वहां जारी पुशबैक की कार्रवाई ने यह गंभीर चिंता पैदा की है कि भारतीय नागरिकों को भी गलत तरीके से हिरासत में लिया जा रहा है या बाहर धकेला जा रहा है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र और राजस्थान के कुछ हिस्सों में दरगाहों और मस्जिदों को भी निशाना बनाया गया है। इन घटनाओं का पैमाना एक बड़ी संस्थागत चुनौती की ओर इशारा करता है, जिसके लिए मिल-जुलकर और प्रभावी तरीके से जवाब देने की जरूरत है। कर्नूला महापंचायत, SIR और Form 7 समेत कानूनी मामलों में हमारे हस्तक्षेप के साथ-साथ हमारी टीमें जमीन पर लगातार काम कर रही हैं, हिंसा की घटनाओं का दस्तावेज तैयार कर रही हैं और प्रभावित समुदायों से बातचीत कर रही हैं।”
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा, “यह एक बड़ी मुहिम और एक अहम पल की शुरुआत है। यह ऐसी समिति है जिसमें पूरे देश के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व है और इसमें नेताओं से लेकर युवाओं तक सभी को शामिल किया गया है। समिति हालात पर लगातार नजर रखेगी और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करेगी। इसका काम सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश के लिए होगा।”
जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी ने असम की स्थिति पर कहा, “असम में हिंदू-मुस्लिम तनाव भाषा के मुद्दे की तुलना में कम है। वहां बेदखली की कार्रवाई बंगाली मुसलमानों तक सीमित है। असमिया और बंगाली मुसलमानों के बीच एक दूरी है। हम दोनों पक्षों के साथ बिना किसी पक्षपात के बराबरी से खड़े हैं।”
मौलाना मोहसिन अली तकवी ने कहा, “आज देश में जिस तरह के हालात हैं, जिस तरह लोगों के साथ नाइंसाफी हो रही है और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को कमजोर किया जा रहा है, ऐसे में इस कोशिश को कामयाब बनाना हम सभी की जिम्मेदारी है।”
फुजैल अहमद अय्यूबी ने कहा, “हमारे धार्मिक रहनुमा, राजनीतिक प्रतिनिधि, सिविल सोसाइटी संगठन और वकील, सभी को एक छतरी के नीचे मिलकर काम करना चाहिए। इस वक्त हम जिस तरह की चुनौती का सामना कर रहे हैं, उसे देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि सभी एक साथ आएं और एक बैनर के नीचे मिलकर इस चुनौती का सामना करें।”
एसक्यूआर इलियास ने कहा, “इस वक्त भारतीय मुसलमान जिस हालात से गुजर रहे हैं, उससे लगता है कि मुसलमानों को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें घेरा जा रहा है। SIR, NRC का एक और रूप नजर आता है, जिसके जरिए मुस्लिम नामों को वोटर लिस्ट से हटाया जा रहा है। BJP शासित राज्यों में UCC लागू किया जा रहा है। लिंचिंग तो पहले से चल रही थी, लेकिन अब धार्मिक मदरसों और संस्थानों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पिछले 78 साल से ‘वंदे मातरम्’ की अहमियत को इस तरह नहीं उठाया गया, लेकिन अब इसे सिर्फ लोगों को परेशान करने के लिए उठाया जा रहा है। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी को एक साथ आना होगा। सभी की भागीदारी जरूरी है। हम भी सबके साथ खड़े हैं।”
राष्ट्रीय निगरानी समिति का गठन 24 जुलाई को हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में लिए गए सामूहिक फैसले के बाद हुआ है। सम्मेलन में मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने संवैधानिक अधिकारों और कानूनी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार और संगठित तरीके से काम करने की जरूरत पर चर्चा की थी।
समिति उन मुद्दों की पहचान करेगी जिनमें हस्तक्षेप की जरूरत है, उपलब्ध संवैधानिक और कानूनी रास्तों पर विचार करेगी, संबंधित संस्थाओं से बातचीत करेगी और जरूरी लोकतांत्रिक और राजनीतिक रास्ते अपनाएगी।
51 सदस्यीय समिति की सूची भी जारी की गई है। यह समिति भारतीय मुसलमानों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक रास्तों के जरिए काम करेगी। समिति के 51 सदस्यों के अलावा 10 सदस्यीय सचिवालय भी होगा, जो इन मुद्दों की निगरानी और समन्वय में मदद करेगा। कार्यक्रम का संचालन IMCR के सचिव आजम बेग ने किया।
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