शब-ए-क़द्र की फ़ज़ीलत व अज़्मत – कारी करामत खान उर्दू अदीब
शब-ए-क़द्र की फ़ज़ीलत व अज़्मत - कारी करामत खान उर्दू अदीब
चूरू जिला मुख्यालय से करामत खान उर्दू अदीब संस्थापक इंसानियत एकता सेवा समिति ने माहे रमज़ान एवं ईद की मुबारकबाद देते हुए बताया कि शब-ए-क़द्र अल्लाह तआला ने ख़ुसूसियत के साथ इस उम्मत यानी उम्मत-ए-मुहम्मदिया को अता फ़रमाई है। ‘शब’ के मा’ना रात के हैं और ‘क़द्र’ के मा’ना अज़्मत व शर्फ़ के हैं। ‘क़द्र’ के दूसरे मा’ना तक़दीर व हुक्म के भी आते हैं। रिवायतों में आता है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उम्मत-ए-मुहम्मदिया की उम्र का तज़्किरा किया, जैसा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद मुबारक है कि मेरी उम्मत की उम्रें साठ साल से लेकर सत्तर साल के दरमियान है, हुज़ूर ने अपनी उम्मत की उम्रों को याद किया और उसके मुक़ाबले में अगली उम्मतों को जो उम्रें दी गईं थीं उसको जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने देखा तो आपको यह ख़याल हुआ कि इबादात में मेरी उम्मत उनका मुक़ाबला नहीं कर सकती, जिसकी वजह से आपके दिल में एक ग़म की सी कैफ़ियत पैदा हुई, तो इस पर अल्लाह तआला की तरफ़ से ‘सूरह-ए-क़द्र’ नाज़िल की गई, जिसमें इरशाद फ़रमाया गया, ‘लैलातुल क़द्रि ख़ैरुम मिन अल्फ़ि शह्र’ ( शब-ए-क़द्र हज़ार महीनों से बहतर है ) और हज़ार महीनों का जब हिसाब लगाया गया तो 83 साल और 4 महीने होते हैं। बाअ्ज़ रिवायतों में यह भी है कि एक मरतबा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बनी इस्राईल के एक आबिद का तज़्किरा किया, जिसने पांच सौ साल तक अल्लाह की इबादत की, यह सुनकर सहाबा-ए-किराम को यह ख़याल हुआ कि हमें तो यह मक़ाम हासिल नहीं हो सकता और इस पर अफ़सोस भी हुआ कि हम बा-वुजूद चाहने के इस पर अमल नहीं कर सकते : इस पर ‘सूरह-ए-क़द्र’ नाज़िल हुई, जिसमें बताया गया कि शब-ए-क़द्र हज़ार महीनों से बहतर है। इसी रात में क़ुरआन शरीफ़ का नुज़ूल हुआ यानी क़ुरआन शरीफ़ लोह-ए-महफ़ूज़ से आसमान-ए-दुनिया पर नाज़िल हुआ।
क़ुरआन-ए-करीम में एक जगह इरशाद फ़रमाया ‘इन्ना अन्ज़लनाहु फ़ी लैलातिम मुबारकतिन’ ( हमने क़ुरआन-ए-पाक को बा-बरकत रात में नाज़िल किया ) यहां पर भी शब-ए-क़द्र मुराद ली गई है। एक रिवायत में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि ‘लैलातुल क़द्र’ को रमज़ान के आख़िर अशरे की ताक़ रातों में तलाश करो। ताक़ रातों से मुराद 21 वीं, 23 वीं, 25 वीं, 27 वीं और 29 वीं रातें हैं। हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि अलैह का क़ौल है कि शब-ए-क़द्र तमाम रमज़ान में दाइर रहती है। इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाहि अलैह का राजेह क़ौल यह है कि इक्कीसवीं शब में होना अक़रब है। इमाम मालिक रहमतुल्लाहि अलैह और इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाहि अलैह का क़ौल यह है कि रमज़ान के आख़िर अशरे की ताक़ रातों में दाइर रहती है, किसी साल किसी रात में और किसी साल किसी दूसरी रात में।
जम्हूर उलमा की राय यह है कि सत्ताईसवीं रात में ज़ियादा उम्मीद है। हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु अन्हा ने पूछा, या रसूलुल्लाह अगर मुझे शब-ए-क़द्र का पता चल जाए तो क्या दुआ मांगूं ? हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह दुआ पढ़ने की ताकीद फ़रमाई ‘अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़्वा फ़ाअ्फ़ु अन्नी’ ( ए अल्लाह बेशक तू मुआफ़ करने वाला है , मुआफ़ी को पसंद करता है, पस मुझे मुआफ़ फ़रमा ) एक हदीस शरीफ़ में है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जो कोई ईमान के साथ और सवाब की निय्यत से इस रात क़ियाम ( इबादत ) करे, उसके पिछले तमाम गुनाह मुआफ़ कर दिये जाते हैं। एक रिवायत में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्ह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद नक़्ल करते हैं कि शब-ए-क़द्र में हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम फ़रिश्तों की एक जमाअत के साथ उतरते हैं और उस शख़्स के लिये जो खड़े या बैठे अल्लाह का ज़िक्र कर रहा हो और इबादत में मश्गूल हो दुआ-ए-रहमत करते हैं। हज़रत इब्न-ए-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्ह की हदीस में है कि फ़रिश्ते हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम के कहने से मुतफ़र्रिक़ हो जाते हैं और कोई घर छोटा-बड़ा, जंगल या कश्ती ऐसी नहीं होती जिसमें कोई मोमिन हो और वे फ़रिश्ते मुसाफ़हा करने के लिये वहां न जाते हों।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मा’मूल हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने बयान फ़रमाया है कि आख़री अशरा दाख़िल होता तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ुद भी इस इस अशरे की रातें जागते थे और अपने घर वालों को भी जगाते थे और कमरबंद कस लिया करते थे। नीज़ हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ानुल मुबारक के आख़री अशरे में जितनी मेहनत फ़रमाते थे उतनी मेहनत और दिनों में नहीं फ़रमाते थे। लिहाज़ा हर ईमान वाले और हर ईमान वाली को चाहिए कि वह तमाम ताक़ रातों में फ़राइज़ की अदाएगी के साथ नफ़ल नमाज़, दुरूद शरीफ़, तिलावत-ए-क़ुरआन, ज़िक्र-ओ-अज़्कार, तौबा-ओ-इस्तिग़फ़ार, तस्बीह-ओ-तहलील और दुआओं का एहतमाम खूब करे, और इस क़ीमती और बा-बरकत और मुबारक रात को फुज़ूल गोई में, सैर-ओ-तफ़रीह में, घूमने-फिरने में, खेल-तमाशों में और बेकार कामों में हरगिज़ ज़ा’ए न करे। क्योंकि साल भर में सिर्फ़ एक बार यह मुबारक रात मुयस्सर होती है। दुआ है कि अल्लाह तआला तमाम ईमान वालों और ईमान वालियों को शब-ए-क़द्र की तमाम बरकतें और रहमतें अता फ़रमाये।
देश
विदेश
प्रदेश
संपादकीय
वीडियो
आर्टिकल
व्यंजन
स्वास्थ्य
बॉलीवुड
G.K
खेल
बिजनेस
गैजेट्स
पर्यटन
राजनीति
मौसम
ऑटो-वर्ल्ड
करियर/शिक्षा
लाइफस्टाइल
धर्म/ज्योतिष
सरकारी योजना
फेक न्यूज एक्सपोज़
मनोरंजन
क्राइम
चुनाव
ट्रेंडिंग
Covid-19







Total views : 2063834

