माहे रमजान का महिना, रोजा (उपवास), त्याग, और इबादत के लिए होता है एवं स्वास्थ्य फिट रहता है – डॉ.एफ एच गोरी सीनियर फिजिशियन
माहे रमजान का महिना, रोजा (उपवास), त्याग, और इबादत के लिए होता है एवं स्वास्थ्य फिट रहता है - डॉ.एफ एच गोरी सीनियर फिजिशियन
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर स्थित डॉ एफ एच गौरी-एम डी मेडिसिन फिजिशियन एच. जे. साइकेट्रिक (मनोरोग), एल एल बी, रिटायर्ड प्रोफेसर, पी एम ओ एवं सुप्रीटेंडेंट चुरु, ने माहे रमजान की मुबारकबाद दी। ओर कहा कि रमजान का महीना चाँद के हिसाब से कभी 29 दिन तो कभी 30 दिन का होता है। इस्लाम में 5 फराईज -ए -इमान है। कलमा शहादत, नमाज, रोजा, जकात, और हज होते हैं। उसमें तीसरा महत्वपूर्ण ‘रोजा’ एक स्तम्भ है। जिस प्रकार माल की शुद्धता के लिए जकात वाजिब की गयी है। उसी प्रकार शरीर की जकात के रूप में शरीर की शुद्धता के लिए रोजा वाजिब किया गया है।
यह शरीर को अशुद्धता को मिटाता है। इस का दूसरा पहलू यह है कि मानव को भूख, प्यास की शिद्दत से गरीबों को होने वाली तकलीफ तथा खाने पिने की कमी से लोगो को होने वाली दुनियावी जिन्दगी का अहसास इन्सानियत की तरफ रुजू करता है। योशिनोरी ओहसुमी एक जापानी साईसदान है जिन्हें फिजियोलोजी एण्ड साइंस के क्षेत्र में ऑटोफेनी की खोज के लिए सन् 2016 में नोबेल प्राइज से नवाजा गया था। ऑटोफेनी एक प्रक्रिया है जिसमें कोशिका टूटने (मरने) के पश्चात उसके अवशेष अवयवों को शरीर पुनः उपयोग में ले लेता है। रोजा, शरीर को अशुद्ध कोशिकाएँ जिसमें कैंसर कारक तथा हानिकारक कोशिकाएँ होती हैं ।
उनको नियंत्रित करने में सहायक है। बढ़ते वजन और कोलेस्ट्रोल को भी निर्वत करने में सहायक है। रोजा शारीरिक व मानसिक संतुलन को अच्छा रखता है। आज तो विज्ञान ने भी रोजा रखने पर सकारात्मक निर्णय लिया है। यह इंसान की मशीनरी को निर्यत्रित करने का तरीका है। इसे धर्म से जोड़कर इसान को तन्दुरुस्त रहने की इस्लाम ने नेमत अता की है। सावधानी रोजा रखने वालों को सेहरी के वक्त तथा इफ्तार के वक्त आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण (ओवर डाईटिंग) करने से बचना चाहिए। अत्यधिक गरिष्ठ व वसीय भोजन ना करके सामान्य तथा उचित मात्रा में भोजन करने पर इसका पूरा लाभ मिलता है।
इसी प्रकार शरीर के हर अंग का रोजा होता है। रोजों में नियमित कार्य करें, नियमित नींद लें. कभी झूठ ना बोलने की आदत पक्की करें। अश्लील व गलत कार्य नहीं करे ,आँख से गलत नहीं देखना है, जबान से गलत नहीं बोलना है, हाथ से गलत नहीं करना है, पाँव से गलत जगह जाने से रुक जाना है। खूब मन लगाकर अपने रब की इबादत करनी है। लगातार इस प्रकार का संयम रखने पर धीरे-धीरे इंसान को को सही रहने की आदत पड़ती है और रोज़ों का पूरा लाभ प्राप्त होताद है। रोजे से इंसान को पानी की अहमियत समझ में आती है और प्यासे की प्यास महसूस करता है इसलिए व्यर्थ पानी नहीं बहाना चाहिए अन्यथा ये नेमत यूं ही व्यर्थ हो जाएगी।
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