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फागोंत्सृव 2026 : चंग की थाप पर झूम उठा चूरू, फागोत्सव में बिखरे लोक संस्कृति के रंग


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फागोंत्सृव 2026 : चंग की थाप पर झूम उठा चूरू, फागोत्सव में बिखरे लोक संस्कृति के रंग

साकार संस्थान का आयोजन, राजलदेसर की चंग पार्टी ने बांधा समां, लोक कलाकार व पत्रकार को स्मृति पुरस्कार से नवाजा

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

चूरू : जिला मुख्यालय पर रंग, उमंग और लोक परंपराओं की जीवंत छटा के बीच आज शाम सफेद घंटाघर पर साकार संस्थान की ओर से हुए फागोत्सव–2026 ने शहरवासियों को लोक संस्कृति से सराबोर कर दिया। रतनलाल पारख की स्मृति में बसंत कुमार व संजय कुमार पारख कोलकाता के सौजन्य से हुए इस आयोजन ने चूरू की सांस्कृतिक विरासत को फिर से जीवंत कर दिया।

राजलदेसर की श्याम म्यूजिकल ग्रुप चंग पार्टी के कलाकारों ने चंग की थाप पर पारंपरिक फाग गीतों की ऐसी रसधार बहाई कि दर्शक खुद को थिरकने से रोक नहीं सके। ‘फाग’ के रंगों में रचे-बसे गीतों और लोकधुनों ने मरुभूमि की लोक संस्कृति की महक बिखेर दी। कार्यक्रम में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक ने पूरे उत्साह के साथ भागीदारी निभाई, जिससे वातावरण पारंपरिक उत्सव में बदल गया। कार्यक्रम में पत्रकार पीयूष शर्मा स्मृति पुरस्कार पत्रकार राहुल शर्मा को तथा पूर्व सभापति रमाकांत ओझा की स्मृति में लोक कलाकार पंकज ओझा को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व सभापति गोविंद महनसरिया ने की। मुख्य अतिथि पूर्व सभापति विजय शर्मा रहे। विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रमोद बाजोरिया, एपीआरओ मनीष कुमार, महेंद्र चौबे, विनोद ओझा, भास्कर शर्मा व हरिप्रसाद पीपलवा उपस्थित रहे।

अतिथियों के साथ गुरुदास भारती, नरेंद्र शर्मा, बिजेंद्र दाधीच, हनुमान शर्मा आदित्य, राकेश दाधीच, कौशल शर्मा, हेमंत प्रजापत, अखिलेश दाधीच सहित अन्य गणमान्य नागरिकों ने प्रतिभाओं को स्मृति पुरस्कार देकर सम्मानित किया। अतिथियों का स्वागत संदीप पाटिल, जगदीश सराफ, संजय सोनी, योगेश गोड़, कानसिंह, पवन शर्मा, सुनील भाऊवाला, मूलचंद दर्जी, अश्वनी व्यास, गौरव दाधीच, हरि मोहता, कमल गोठेचा, राजेश बांठिया, डॉ. शंकर सिंह गोड़, विश्वनाथ राजगुरु, दिनेश स्वामी, विपिन दाधीच व विजय सारस्वत ने किया। संचालन उमेश दाधीच ने किया। खास बात ये थी की फागोत्सव के आयोजन ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता की दौड़ में भी लोक संस्कृति की जड़ों को संजोए रखना जरूरी है। चंग की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक सहभागिता ने चूरू की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त बनाया।

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