माहे रमजान के पवित्र महीने का सबसे खुशनुमा और सुकून भरा वक्त होता है रोजा इफ्तार
माहे रमजान के पवित्र महीने का सबसे खुशनुमा और सुकून भरा वक्त होता है रोजा इफ्तार
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर माहे रमजान के पहले रोजा इफ्तार किया गया। मुस्लिम समुदाय में रमजान के पवित्र महीने का सबसे खुशनुमा और सुकून भरा वक्त होता है। पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर अल्लाह की इबादत करने के बाद, शाम को सूरज ढलते ही जब रोजा खोला जाता है, तो उसे ‘इफ्तार’ कहते हैं । इसकी शुरुआत अक्सर खजूर और पानी से की जाती है, जो सुन्नत (पैगंबर का तरीका) माना जाता है । इफ्तार केवल खाना खाने का नाम नहीं है, बल्कि यह सब्र, शुक्र और भाईचारे का प्रतीक है। इस मौके पर परिवार के सभी सदस्य एक साथ दस्तरख्वान पर बैठते हैं। और अल्लाह से दुआ मांगते हैं।
मस्जिदों और सार्वजनिक जगहों पर सामूहिक इफ्तार का आयोजन होता है, जहाँ अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और सभी मिलकर प्रेम और एकता के साथ भोजन साझा करते हैं। इफ्तार का समय एक मोमिन के लिए बेहद खुशियों और बरकतों वाला होता है। इस्लाम में इसकी अहमियत इस कदर है कि हदीस के मुताबिक, “रोज़ेदार के लिए दो खुशियाँ हैं: एक इफ्तार के समय और दूसरी अपने रब से मुलाकात के वक्त।”इफ्तार की प्रमुख बरकतें और महत्व है।
- दुआओं की कबूलियतः इफ्तार से ठीक पहले का वक्त दुआओं की कबूलियत का होता है। अल्लाह इस समय अपने बंदों की आज़िज़ी और प्यास को देखकर उनकी जायज़ मुरादें पूरी फरमाता है।
- सुन्नत का सवाबः खजूर या पानी से जल्द इफ्तार करना सुन्नत है। वक्त पर रोज़ा खोलना अल्लाह को बेहद महबूब है।
- सामूहिकता और भाईचाराः परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर इफ्तार करना आपसी मोहब्बत को बढ़ाता है। दूसरों को इफ्तार कराने का सवाब रोज़ेदार के बराबर ही बताया गया है।
- शुक्रगुज़ारी का अहसासः दिन भर की भूख-प्यास के बाद जब रिज़्क सामने आता है, तो इंसान को अल्लाह की नेमतों की असली कद्र महसूस होती है। इफ्तार केवल खाना खाने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत और उसके शुक्र का एक मुकद्दस पड़ाव है।
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