तथाकथित सेक्यूलर पार्टियां और मुस्लिम रहनुमा बनाम मुसलमानों की सियासी दुर्दशा
सवाल सिर्फ सियासी हिस्सेदारी का नहीं, आत्ममंथन का भी है; तालीम, कारोबार, सामाजिक सुधार और मजबूत नेतृत्व के बिना राजनीतिक प्रभाव अधूरा
मुसलमानों की सियासी दुर्दशा : भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और मुस्लिम समाज देश की बड़ी आबादी का हिस्सा है। इसके बावजूद मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी और प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। सवाल यह है कि जिस समाज की चुनावी भूमिका दशकों तक विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण रही, उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी और निर्णय प्रक्रिया में प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर क्यों दिखाई देता है?
लेखक के अनुसार, आजादी के बाद शुरुआती चुनावों के दौर की तुलना में वर्तमान समय में मुस्लिम समाज की राजनीतिक स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। खासतौर पर 2014 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में आए बदलाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और चुनावी रणनीतियों ने इस बहस को और तेज किया है।
मुस्लिम मुद्दों पर बोलने से राजनीतिक दल क्यों हिचकते हैं?
लेख का एक प्रमुख सवाल यह है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले राजनीतिक दल मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलने से क्यों बचते हैं। लेखक का मानना है कि कई दलों को यह आशंका रहती है कि मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दे उठाने पर उन पर ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का आरोप लगाया जा सकता है और इससे बहुसंख्यक मतदाताओं में राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर, भाजपा की राजनीति को लेकर लेखक का आरोप है कि धार्मिक और सामुदायिक ध्रुवीकरण ने मुस्लिम मतदाताओं को राजनीतिक बहस के एक अलग घेरे में धकेल दिया है। इस दावे पर राजनीतिक दलों के अपने-अपने मत हैं, लेकिन इतना जरूर है कि भारतीय राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी का सवाल आज भी बहस का विषय है।
केंद्र में मुस्लिम मंत्री नहीं, जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री
वर्तमान केंद्र सरकार की आधिकारिक मंत्रिपरिषद सूची में कोई मुस्लिम मंत्री शामिल नहीं है। वहीं जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री हैं। जम्मू-कश्मीर वर्तमान में केंद्र शासित प्रदेश है और वहां निर्वाचित सरकार कार्यरत है। यही स्थिति राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—क्या मुस्लिम समाज की आबादी के अनुपात में उसकी राजनीतिक भागीदारी पर्याप्त है? और क्या राजनीतिक दलों के भीतर मुस्लिम नेतृत्व को निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त स्थान मिल रहा है?
सिर्फ राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं या समाज को भी आत्ममंथन करना होगा?
लेखक का तर्क है कि मुस्लिम समाज की राजनीतिक स्थिति के लिए केवल राजनीतिक दलों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। समाज को भी अपनी सियासी, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से विचार करना होगा। राजनीतिक प्रभाव केवल चुनाव के समय वोट देने से पैदा नहीं होता। उसके लिए शिक्षा, आर्थिक मजबूती, संगठित सामाजिक नेतृत्व और विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। यदि कोई समाज शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में पिछड़ता है, आर्थिक रूप से कमजोर रहता है और राजनीतिक संगठनों में पर्याप्त नेतृत्व तैयार नहीं करता, तो उसकी राजनीतिक bargaining power भी सीमित हो सकती है।
मजहबी और सामाजिक रहनुमाओं से भी सवाल
लेख में मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। लेखक का आरोप है कि कई जगह सामुदायिक नेतृत्व अपने समाज की वास्तविक समस्याओं पर उतनी मजबूती से आवाज नहीं उठाता, जितनी आवश्यकता है। जुआ, सट्टा, नशा, युवाओं में बढ़ती गैर-जिम्मेदाराना गतिविधियां, परिवारों की आर्थिक समस्याएं और शिक्षा की कमी जैसे मुद्दे किसी भी समाज के भविष्य को प्रभावित करते हैं।
सवाल यह है कि मस्जिदों, सामाजिक संस्थाओं, जमाअतों, खानकाहों और अन्य सामुदायिक संगठनों से जुड़े जिम्मेदार लोग इन समस्याओं के खिलाफ कितनी प्रभावी सामाजिक मुहिम चलाते हैं? लेखक का मत है कि केवल भाषणों और तकरीरों से समाज नहीं बदलेगा। सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जमीन पर अभियान चलाना होगा और युवाओं को शिक्षा, रोजगार तथा सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना होगा।
राहुल गांधी, अखिलेश से लेकर ममता बनर्जी तक—सवाल नेताओं से भी
मुस्लिम समाज में अक्सर यह सवाल उठता है कि राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल, मायावती और ममता बनर्जी जैसे नेता मुस्लिम समाज के मुद्दों पर खुलकर क्यों नहीं बोलते। लेखक का कहना है कि राजनीतिक नेताओं से सवाल करना जरूरी है। लेकिन इसके साथ समाज को अपने नेतृत्व से भी सवाल करना चाहिए। यदि स्थानीय स्तर पर सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व किसी मुद्दे को संगठित रूप से नहीं उठाता, तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से यह उम्मीद करना कि वे लगातार उस मुद्दे को अपना प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाएंगे, अपने आप में पर्याप्त रणनीति नहीं हो सकती।
एक पार्टी से स्थायी जुड़ाव के बजाय हर जगह भागीदारी
लेख में मुस्लिम समाज के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक के तौर पर विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय भागीदारी का सुझाव दिया गया है। लेखक का मानना है कि समाज को केवल किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसके शिक्षित, योग्य और सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों को विभिन्न राजनीतिक दलों में अपनी जगह बनानी चाहिए। पंचायत से लेकर नगर निकाय, विधानसभा और संसद तक मुस्लिम समाज को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो केवल चुनाव के समय दिखाई न दे, बल्कि पूरे पांच साल जनता के बीच काम करे।
तालीम और आर्थिक आत्मनिर्भरता बने प्राथमिकता
राजनीतिक ताकत की नींव सामाजिक और आर्थिक मजबूती से बनती है। इसलिए मुस्लिम समाज के सामने शिक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में होनी चाहिए। बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं का कौशल विकास, उच्च शिक्षा, रोजगार, आधुनिक कारोबार, उद्यमिता और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर विशेष ध्यान देना होगा। समाज में ऐसे संस्थान और नेतृत्व तैयार करने होंगे जो आने वाली पीढ़ी को केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि शिक्षा और अवसरों से मजबूत करें।
नफरत नहीं, लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव
लेख का अंतिम संदेश समाज के भीतर आत्मनिर्भरता और आत्ममंथन पर केंद्रित है। किसी भी समुदाय की समस्याओं का समाधान दूसरे समुदाय के प्रति नफरत या टकराव में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, शिक्षा, सामाजिक सुधार और आर्थिक मजबूती में है। जरूरतमंदों की मदद, परिवार और पड़ोस की जिम्मेदारी, ईमानदार कारोबार, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक भाईचारे को मजबूत करना किसी भी समाज की वास्तविक ताकत बन सकता है। गलत कामों और गलत प्रवृत्तियों के खिलाफ आवाज भी उठानी होगी, लेकिन वह आवाज संविधान, कानून और लोकतांत्रिक तरीकों के दायरे में होनी चाहिए।
आखिर रास्ता क्या है?
मुस्लिम समाज की राजनीतिक दुर्दशा पर बहस केवल इस सवाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि कौन-सी पार्टी उसके लिए क्या कर रही है। इससे बड़ा सवाल यह है कि समाज खुद अपनी राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक ताकत बढ़ाने के लिए क्या कर रहा है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व मांगने के साथ नेतृत्व पैदा करना होगा, अधिकारों की बात करने के साथ जिम्मेदारियां निभानी होंगी और शिकायतों के साथ समाधान की दिशा में भी काम करना होगा। यही आत्ममंथन किसी भी समाज को राजनीतिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से जिम्मेदार और लोकतांत्रिक रूप से प्रभावी बना सकता है।
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